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ग़ज़ल
बसने दो नशेमन को अपने फिर हम भी करेंगे सैर-ए-चमन
जब तक कि नशेमन उजड़ा है फूलों का नज़ारा कौन करे
आनंद नारायण मुल्ला
ग़ज़ल
मिरे दिल में बसने वाले तुझे कैसे भूल जाऊँ
तिरा इश्क़ मेरा मज़हब तिरी याद ज़िंदगी है
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
क्या ख़सारा है इन्हें बच्चों का घर बसने में
हम तअ'ज्जुब से बुज़ुर्गों की तरफ़ देखते हैं
नादिर अरीज़
ग़ज़ल
अब क्या बताएँ क्या था ख़यालों के शहर में
बसने से पहले वक़्त के हाथों उजड़ गया
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
मुझ में बसने वाले शख़्स ने मुझ में रहना छोड़ दिया
उस ने मेरी बात न मानी मैं ने कहना छोड़ दिया
ज़ेहरा शाह
ग़ज़ल
भीतर बसने वाला ख़ुद बाहर की सैर करे मौला ख़ैर करे
इक मूरत को चाहे फिर का'बे को दैर करे मौला ख़ैर करे