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ग़ज़ल
मिरी बे-साख़्ता हिचकी मुझे खुल कर बताती है
तिरे अपनों को गाओं में तो अक्सर याद आता है
आलोक श्रीवास्तव
ग़ज़ल
ये फ़ुग़ाँ ये शोर ये नाले ये शेवन थे फ़ुज़ूल
क्या बताती थी मोहब्बत और क्या समझा था मैं
बहज़ाद लखनवी
ग़ज़ल
न चश्म-ए-तर बताती है न ज़ख़्म-ए-सर बताते हैं
वो इक रूदाद जो सहमे हुए ये घर बताते हैं