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ग़ज़ल
जिस की आँखों ने किया बज़्म-ए-दो-आलम को ख़राब
कोई उस फ़ित्ना-ए-दौराँ से कहो इश्क़ अल्लाह
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
ज़रा सा दिल है लेकिन जान है बज़्म-ए-दो-आलम की
ये सारी गर्मी-ए-हंगामा क़ल्ब-ए-ना-तवाँ तक है
अब्दुर्रशीद ख़ान कैफ़ी महकारी
ग़ज़ल
बादा-नोशी में अगर हुस्न-ए-अक़ीदत है शरीक
बज़्म-ए-साक़ी सज्दा-गाह-ए-दो-जहाँ हो जाएगी
मसूद मैकश मुरादाबादी
ग़ज़ल
ये बज़्म-ए-रंग-ओ-बू है जो हम से सजी हुई
लुट जाएगी ये बज़्म घड़ी दो घड़ी के बाद
ज़हीरुन्निसा निगार
ग़ज़ल
हसन अख्तर जलील
ग़ज़ल
चाहता हूँ इक इंक़लाब ज़ौक़-ए-जमालियात में
बंद-ए-नक़ाब खोल दो बज़्म-ए-तअ'य्युनात में
शादाँ इंदौरी
ग़ज़ल
क्यूँ न उस शब से नए दौर का आग़ाज़ करें
बज़्म-ए-ख़ूबाँ से कोई नग़्मा सुना दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
'आलम' ख़ुदा के वास्ते कह दो जो दिल में है
बज़्म-ए-सुख़न में आज का सरदार मैं ही हूँ