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ग़ज़ल
गर चमन में हम से बे-बर्गों को जा देती नहीं
ख़ार की मानिंद बिठला दें सर-ए-दीवार पर
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ग़ज़ल
बे-सर-ओ-बर्गों को क्या निस्बत है सैर-ए-बाग़ से
दाग़-ए-दिल हैं हम तही-दस्तान-ए-पा दर-गिल के गुल
हसरत अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
फल फूल नहीं लाते ये बाग़-ए-मोहब्बत में
हर नख़्ल-ए-तमन्ना को बे-बर्ग-ओ-समर देखा
रियाज़ ख़ैराबादी
ग़ज़ल
लहू से आब्यारी करने वालो कुछ तो सोचो
ये सारा बाग़ बे-बर्ग-ओ-समर क्यूँ लग रहा है