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ग़ज़ल
टोका-टाकी बस इक हद तक ठीक नतीजा देती है
बच्चा बिगड़ता है गर उस पे बे-मतलब की सख़्ती हो
अहमद अज़ीम
ग़ज़ल
दिल भी एक सितारा है जो टूट रहा है क़िस्तों में
रोज़ तिरी ख़्वाहिश में बे-मतलब मिट्टी हो जाता है
विभा जैन 'ख़्वाब'
ग़ज़ल
कहीं भी हो नतीजा जंग का अच्छा नहीं होता
लड़ाई जो भी होती है वो बे-मतलब में होती है
राहिब मैत्रेय
ग़ज़ल
अपने ख़ास किसी मक़्सद से जो रस्ते वाबस्ता हैं
बे-मतलब ही घूम रहे हैं उन पर भीड़ जमाए लोग