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ग़ज़ल
रवय्या देख कर उन का तो हम नाशाद हो बैठे
भला लहजे से वो क्यों नश्तर-ए-फ़स्साद हो बैठे
अबू हुरैरा अब्बासी
ग़ज़ल
मुझे तस्लीम बे-चून-ओ-चुरा तू हक़-ब-जानिब था
मिरे अन्फ़ास पर लेकिन 'अजब पिंदार ग़ालिब था
शहराम सर्मदी
ग़ज़ल
तुझ में बू पाई न मुतलक़ कहीं जिंसिय्यत की
नस्ल-ए-आदम से तू ऐ शोख़ पिसर है कि नहीं