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ग़ज़ल
सर-ब-सर एक चमकती हुई तलवार था मैं
मौज-ए-दरिया से मगर बर-सर-ए-पैकार था मैं
राजेन्द्र मनचंदा बानी
ग़ज़ल
जिस्म-ए-बे-सर कोई बिस्मिल कोई फ़रियादी था
हश्र-सामानियाँ थीं मंज़िल-ए-जानाँ के क़रीब
सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर
ग़ज़ल
मैं ने कब दावा किया था सर-ब-सर बाक़ी हूँ मैं
पेश-ए-ख़िदमत हों तुम्हारे जिस क़दर बाक़ी हूँ मैं
ज़फ़र इक़बाल
ग़ज़ल
भरे हैं उस परी में अब तो यारो सर-ब-सर मोती
गले में कान में नथ में जिधर देखो उधर मोती