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ग़ज़ल
दिल दरिया है दिल सागर है इस दरिया इस सागर की
एक ही लहर का आँचल थामे सारी उमर बिता देना
रईस फ़रोग़
ग़ज़ल
बेटा बेटी फ़ोन पर अक्सर बताते हैं मुझे
वक़्त मिलता ही नहीं है गाँव आने के लिए
शिवकुमार बिलग्रामी
ग़ज़ल
मिरी उम्र-ए-रवाँ के साथ ये भी बढ़ता जाता है
मिरा बेटा मिरी आँखों की बीनाई से बेहतर है
नसीम निकहत
ग़ज़ल
उस के बेटा बेटी कॉलेज उसी तरफ़ से जाते हैं
रात को जिस ने बीच सड़क पर फेंका है इक गीला सच
बद्र वास्ती
ग़ज़ल
ब्याज में खेत न ज़ेवर न वो धन चाहता है
सूद-ख़ोर आज तो बेवा का बदन चाहता है
राजीव रियाज़ प्रतापगढ़ी
ग़ज़ल
अपाहिज बाप को बेटा अकेला छोड़ जाता है
मुसीबत में तो अक्सर साथ साया छोड़ जाता है