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ग़ज़ल
अरक़-ए-बहार-ए-शराब है वो ही आज छिड़केंगे आप पर
न तो बेद-ए-मुश्क है इस घड़ी न तो केवड़ा न गुलाब है
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
सुब्ह कू-ए-यार में बाद-ए-सबा पकड़ी गई
या'नी ग़ीबत में गुलों की मुब्तला पकड़ी गई
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
अहद-ए-तिफ़्ली से जुनून-ए-इश्क़ कामिल है शफ़ीक़
शाख़-ए-नख़्ल-ए-बेद-ए-मजनूँ से मिरा गहवारा था
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
पिन्हाँ हुआ है ख़ाल-ए-ख़त-ए-मुश्क-बार में
मिलता नहीं है ढूँढे से नाफ़ा ततार में
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ग़ज़ल
ये मुमकिन है निगाह-ए-इश्क़ से पिन्हाँ रहे जल्वा
मगर एहसास-ए-ज़ुल्फ़-ए-मुश्क-बू किस की इनायत है
सालिक लखनवी
ग़ज़ल
बेद-ए-मजनूँ को हो जब देखते ऐ अहल-ए-नज़र
किसी मजनूँ को भी आशुफ़्ता-बसर देखते हो