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ग़ज़ल
मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की
तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के
राहत इंदौरी
ग़ज़ल
एक निगाह का सन्नाटा है इक आवाज़ का बंजर-पन
मैं कितना तन्हा बैठा हूँ क़ुर्बत के वीराने में
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
मोहब्बत हो तो जाती है मोहब्बत की नहीं जाती
ये शो'ला ख़ुद भड़क उठता है भड़काया नहीं जाता
मख़मूर देहलवी
ग़ज़ल
जहाँ तन्हा हुए दिल में भँवर से पड़ने लगते हैं
अगरचे मुद्दतें गुज़रीं किनारे से लगे हम को
अहमद मुश्ताक़
ग़ज़ल
कहीं आबलों के भँवर बजें कहीं धूप-रूप बदन सजें
कभी दिल को थल का मिज़ाज दे कभी चश्म-ए-तर को चनाब कर