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ग़ज़ल
हम-नशीं पूछ न उस शोख़ की ख़ूबी मुझ से
क्या कहूँ तुझ से ग़रज़ जी को मिरे भाता है
ख़्वाजा मीर दर्द
ग़ज़ल
ऐ फ़लक उन को नहीं भाता सितारों का भी जोड़
कहते हैं मेरी बला पहने कुँवारी चूड़ियाँ
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
जितने बन बन के निकलते हैं सनम नाम-ए-ख़ुदा
सब में भाता है मुझे उस का बिगड़ कर चलना
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
दिल में इक गौहर-ए-ख़ूबी की मोहब्बत का है जोश
आज-कल भाता है दरिया का किनारा मुझ को
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
मैं भला किस से कहूँ क्या क्या कहूँ कैसे कहूँ
मौत से पहले ही मर जाने की ख़्वाहिश दिल में है
सरवर आलम राज़
ग़ज़ल
आग़ा अकबराबादी
ग़ज़ल
'वहशत' इस मिस्रा-ए-जुरअत ने मुझे मस्त किया
कुछ तो भाया है कि अब कुछ नहीं भाता है मुझे