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ग़ज़ल
ये लाली और बिंदी 'रीत' क्यों भाते नहीं तुम को
इसी श्रंगार से तो जिस्म औरत का सँवरता है
ऋतु सिंह राजपूत रीत
ग़ज़ल
अब तो मुझ को रंग ही भाते नहीं तब तो तेरी
ज़ुल्फ़ के साए धनक के रंगों से बढ़ कर लगे
जी आर वशिष्ठ
ग़ज़ल
उसे यारों मिरे अशआ'र जाने क्यों नहीं भाते
जो ऊला ठीक से पढ़ ले तो सानी छोड़ देती है
अविनाश जोशी
ग़ज़ल
बे-मुरव्वत हैं तो वापस ही उठा ले शब-ओ-रोज़
मुझ को भाते नहीं ये तेरे निराले शब-ओ-रोज़