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ग़ज़ल
कहानी का ये हिस्सा अब भी कोई ख़्वाब लगता है
तिरा सर पर बिठा लेना मिरा दस्तार हो जाना
मुनव्वर राना
ग़ज़ल
बिठा के अर्श पे रक्खा है तू ने ऐ वाइ'ज़
ख़ुदा वो क्या है जो बंदों से एहतिराज़ करे
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मक़्सद-ए-ज़ीस्त ग़म-ए-इश्क़ है सहरा हो कि शहर
बैठ जाएँगे जहाँ चाहो बिठा दो हम को
एहसान दानिश कांधलवी
ग़ज़ल
आशिक़ के घर की तुम ने बुनियाद को बिठाया
ग़ैरों को पास अपने हर दम बिठा बिठा कर