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ग़ज़ल
लफ़्ज़ अगर बोते तो फिर फ़स्ल-ए-मआनी काटते
दोस्तो! अब शिकवा-ए-अहल-ए-हुनर करते हो क्यूँ
इक़बाल साजिद
ग़ज़ल
ये ख़ुश्क क़लम बंजर काग़ज़ दिखलाएँ किसे समझाएँ क्या
हम फ़स्ल निराली काटते थे हम बीज अनोखे बोते थे
अब्दुल अहद साज़
ग़ज़ल
क़ल्ब की बंजर ज़मीं पर ख़्वाहिशें बोते हुए
ख़ुद को अक्सर देखता हूँ ख़्वाब में रोते हुए
ऐन इरफ़ान
ग़ज़ल
अब किसी पेड़ पे लगते नहीं अख़्लाक़ के फल
ज़िंदगी थक गई इस बीज को बोते बोते