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ग़ज़ल
काश अब बुर्क़ा मुँह से उठा दे वर्ना फिर क्या हासिल है
आँख मुँदे पर उन ने गो दीदार को अपने आम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
जिस दिन कि उस के मुँह से बुर्क़ा उठेगा सुनियो
उस रोज़ से जहाँ में ख़ुर्शीद फिर न झाँका
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
ख़ुर्शीद-ओ-क़मर प्यारे रहते हैं छुपे कोई
रुख़्सारों को गो तू ने बुर्क़ा से छुपा रखा
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
पहन कर बुर्क़ा आतंक-वादी लगती हैं महिलाएँ
जिसे तुम पर्दा कहते हो वो पर्दा हो नहीं सकता
वहिद अंसारी बुरहानपुरी
ग़ज़ल
शाह नसीर
ग़ज़ल
तुझ रुख़ से न बुर्क़ा उठा ऐ ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद
ज़र्रा तिरा मुश्ताक़ों ने दीदार न पाया
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
ग़ज़ल
अल्लाह-रे बुर्क़ा तिरा और उस के ये रौज़न
देखे जो छुपा यूँ तुझे रू-पोश में मर जाए
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
टुक ऐ बुत अपने मुखड़े से उठा दे गोशा-ए-बुर्क़ा
कि इन मस्जिद-नशीनों को है दावा दीन-दारी का
मीर मोहम्मदी बेदार
ग़ज़ल
उठा कर नाज़ से बुर्क़ा दिखा कर रू-ए-ज़ेबा को
तमाशा कर दिया दिलबर ने मुझ महव-ए-तमाशा को