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ग़ज़ल
बू-ए-गुल रक़्स में है बाद-ए-ख़िज़ाँ रक़्स में है
ये ज़मीं रक़्स में है सारा जहाँ रक़्स में है
ज़ाहिदा ज़ैदी
ग़ज़ल
ब-रंग-ए-बू-ए-गुल उस बाग़ के हम आश्ना होते
कि हमराह-ए-सबा टुक सैर करते फिर हवा होते
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
बुलबुल को फिर चमन में लगा लाई बू-ए-गुल
ऐ काश होती गुल-बदनों में भी ख़ू-ए-गुल
हकीम सय्यद मोहम्मद ग़ाज़ीपुरी
ग़ज़ल
फ़ज़ा में बू-ए-गुल-ए-मुश्क-बार है कि नहीं
हवा के दोष पे पैग़ाम-ए-यार है कि नहीं
लुत्फुल्लाह खां नज़्मी
ग़ज़ल
बू-ए-गुल पत्तों में छुपती फिर रही थी देर से
ना-गहाँ शाख़ों में इक दस्त-ए-सबा रौशन हुआ