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ग़ज़ल
नासिर काज़मी
ग़ज़ल
चढ़ता दरिया एक न इक दिन ख़ुद ही किनारे काटेगा
अपने हँसते चेहरे कितने तूफ़ानों को छुपाएँगे
बशर नवाज़
ग़ज़ल
ख़ून-ए-जिगर से क़ौल रहा ये मेरे अश्क-ए-चश्म-ए-तर का
चढ़ता दरिया बहता दरिया मैं ही मैं हूँ तू ही तू है
नूह नारवी
ग़ज़ल
चढ़ता सूरज देख के ख़ुश हैं कौन नहीं समझाए
तपती धूप में कुम्हलाएँगे ग़ुंचे जैसे लोग