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ग़ज़ल
दिन गुज़रते हैं मह-ओ-साल गुज़र जाते हैं
वक़्त के पाँव भी चल चल के थके जाते हैं
जावेद कमाल रामपुरी
ग़ज़ल
ज़ुल्फ़-ए-कज-रफ़्तार की कब चाल चल सकता है वो
ऐसी ठोकर खाए सर बन जाए रोड़ा साँप का