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ग़ज़ल
तुम्हारे हुस्न में अब चाँद सी चम-चम नहीं होती
तुम्हारी पायलों में पहले सी छम-छम नहीं होती
मीना भट्ट
ग़ज़ल
छम छम छम छम नाचती मौजें ये सरगोशी करती जाएँ
तूफ़ानों की राह तकेंगे कब तक ये मजबूर किनारे
नूर बिजनौरी
ग़ज़ल
चम चम करते हुस्न की तुम जो अशरफ़ियाँ लाए हो
इस मीज़ान में ये दुनियावी दाम नहीं चल सकता
अंजुम सलीमी
ग़ज़ल
मैं अपने कमरे में बैठा तन्हा तन्हा जलता हूँ
छत पर छम-छम नाच रही है कैसी बरखा रानी है
मक़सूद अनवर मक़सूद
ग़ज़ल
ख़ुशियों की इक नार नवेली छम-छम नाचे महलों में
अपने घर तक कैसे आए मैं भी सोचूँ तू भी सोच
शुजा फ़र्रुख़ी
ग़ज़ल
छम-छम बरसे बहता जाए ये भी बताओ ऐसा क्यों
आँखों से जो छलक रहा है तुम कहते हो पानी है