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ग़ज़ल
न 'चंदा' को तमअ जन्नत की ने ख़ौफ़-ए-जहन्नम है
रहे है दो-जहाँ में हैदर-ए-कर्रार से मतलब
मह लक़ा चंदा
ग़ज़ल
उन की नन्ही उँगली तो अब कम्पयूटर से खेले है
आज के बच्चों की नज़रों में चंदा-मामा कुछ भी नहीं
तनवीर गौहर
ग़ज़ल
चंदा के उजयारे रथ में जाने पी कब आएँगे
बिर्हा के अँधियारे पथ पर नैन बिछाए बैठे हैं