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ग़ज़ल
निगह-ए-नाज़ में ये पिछले पहर रंग-ए-ख़ुमार
नींद में डूबी हुई चंद्र-किरन क्या कहना
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
भूले-बिसरे सपने खोजें ब्याकुल नैनाँ बेकल हृदय
चंद्र किरन सी मुस्काती थी दहके हुए अँगारों में
इशरत क़ादरी
ग़ज़ल
ख़ुदा ने किस शहर अंदर हमन को लाए डाला है
न दिलबर है न साक़ी है न शीशा है न प्याला है
पंडित चंद्र भान ब्रह्मण
ग़ज़ल
क्या हुस्न है यूसुफ़ भी ख़रीदार है तेरा
कहते हैं जिसे मिस्र वो बाज़ार है तेरा
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
ग़ज़ल
हिजाब बन के वो मेरी नज़र में रहता है
मुझी से पर्दा है मेरे ही घर में रहता है
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
ग़ज़ल
पहले तो उस की ज़ात ग़ज़ल में समेट लूँ
फिर सारी काएनात ग़ज़ल में समेट लूँ
चंद्र प्रकाश जौहर बिजनौरी
ग़ज़ल
अपना ख़ुर्शीद और अपना ही क़मर पैदा कर
तू मोहब्बत का शजर है तो समर पैदा कर
राम चंद्र वर्मा साहिल
ग़ज़ल
वो क्या जवाब दे अर्ज़-ए-सवाल से पहले
न समझे बात जो इज़हार-ए-हाल से पहले