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ग़ज़ल
निर्मल नदीम
ग़ज़ल
ख़ाक तो हम भी हर इक दश्त की छाने हुए हैं
कुछ नया करने की कोशिश में पुराने हुए हैं
असअ'द बदायुनी
ग़ज़ल
अब भी काफ़ी है ये हर शोर पे छाने के लिए
कोई उल्फ़त की अज़ाँ दे तो तिरे नाम के साथ