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ग़ज़ल
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़
सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़
वरुन आनन्द
ग़ज़ल
भले ज़माने थे जब शेर सुहूलत से हो जाते थे
नए सुख़न के नाम पे 'अज़हर' 'मीर' का चर्बा होता था
अज़हर फ़राग़
ग़ज़ल
मैं ने सारी दुनिया में बस एक हसीना देखी है
बाक़ी कोई हुस्न नहीं है चर्बा है शहज़ादी का
अहमद अज़ीम
ग़ज़ल
रौशन कैसे होगा सवाद-ए-हर्फ़ जो ख़ून-ए-दिल न जला
चर्बा तुम 'ग़ालिब' का उतारो चाहे ब-रंग-ए-'मीर' लिखो
इलियास इश्क़ी
ग़ज़ल
मार कर चतुराई से चर्बा किया और पढ़ दिया
शे'र कितने ही उड़ा कर 'मीर' के दीवान से