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ग़ज़ल
तिश्ना तिश्ना से बदन में है शराबी नश्शा
चश्मा-ए-फ़ैज़ तिरी आँख से फिर जारी है
ख़ालिद मलिक साहिल
ग़ज़ल
वही चश्मा-ए-बक़ा था जिसे सब सराब समझे
वही ख़्वाब मो'तबर थे जो ख़याल तक न पहुँचे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र 'फ़ैज़' न जाने क्या हुए
रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन
तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं