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ग़ज़ल
साइकल थोड़ी चौबीस इंची ऊँट चलाया करते थे
वो भी तीन चरण में भय्या क़ैंची डंडा फिर गद्दी
शारिक़ क़मर
ग़ज़ल
हँसी के साथ याँ रोना है मिसल-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना
किसी ने क़हक़हा ऐ बे-ख़बर मारा तो क्या मारा
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
मय-ख़ाने में सौ मर्तबा मैं मर के जिया हूँ
है क़ुलक़ुल-ए-मीना मुझे क़ुम-क़ुम से ज़ियादा
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
वो क़ुलक़ुल-ए-मीना में चर्चे मिरी तौबा के
और शीशा-ओ-साग़र की मय-ख़ाने में सरगोशी
बेदम शाह वारसी
ग़ज़ल
वास्ते मूज़ी के आख़िर में भी मूज़ी बन गया
सर किसी हालत में बे-कुचले न छोड़ा साँप का
रिन्द लखनवी
ग़ज़ल
हो ये लब्बैक-ए-हरम या ये अज़ान-ए-मस्जिद
मय-कशो क़ुलक़ुल-ए-मीना की सदा याद रहे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ
ला साक़िया प्याला कि तौबा का क़ुल हुआ