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ग़ज़ल
वो अपनी जगह ख़ुश-गुमाँ थी कि दाइम है पहली मोहब्बत
मैं अपने तईं मुतमइन था कि ये दूसरा तजरबा है
जव्वाद शैख़
ग़ज़ल
ग़नीमत तुम इसे समझो कि इस ख़ुम-ख़ाने में यारो
नसीब इक-दम दिल-ए-ख़ुर्रम हमें भी हो तुम्हें भी हो
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
दाइम-उल-हब्स इस में हैं लाखों तमन्नाएँ 'असद'
जानते हैं सीना-ए-पुर-ख़ूँ को ज़िंदाँ-ख़ाना हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
दाइम है सुल्तानी हम शहज़ादों ख़ाक-निहादों की
बर्क़-ओ-शरर की मसनद हो या तख़्त-ए-बाद-ए-बहारी हो
इरफ़ान सिद्दीक़ी
ग़ज़ल
सूरज है गो ना-मेहरबाँ है सर पे नीला साएबाँ
ऐ आसमाँ ऐ आसमाँ दाइम रहे साया तिरा
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
ग़ज़ल
वस्ल की शाम-ए-सियह उस से परे आबादियाँ
ख़्वाब दाइम है यही मैं जिन ज़मानों में रहूँ
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है
तबद्दुल याँ है हर साअ'त कभी यूँ है कभी वूँ है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
दर्द का कुछ तो हो एहसास दिल-ए-इंसाँ में
सख़्त नाशाद है दाइम जो यहाँ शाद रहे