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ग़ज़ल
दामन-ए-सद-चाक को इक बार सी लेता हूँ मैं
तुम अगर कहते हो तो कुछ रोज़ जी लेता हूँ मैं
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
नग़्मा ऐसा भी मिरे सीना-ए-सद-चाक में है
ख़ौफ़ से हश्र बपा गुम्बद-ए-अफ़्लाक में है
सय्यद आबिद अली आबिद
ग़ज़ल
जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शो'ला पासबानी
तो फ़सुर्दगी निहाँ है ब-कमीन-ए-बे-ज़बानी