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ग़ज़ल
ताब असलम
ग़ज़ल
लो तुम भी शौक़ से 'असलम' से एहतियात रखो
हमें भी आ गया अपनों से फ़ासला रखना
मोहम्मद असलम ख़ान असलम
ग़ज़ल
ज़रा से अश्क में छुप कर उन आँखों में नहीं रहना
चलो 'असलम' हमी कू-ए-तमन्ना छोड़ देते हैं
असलम कोलसरी
ग़ज़ल
इधर से भी कोई गुज़रे कि मैं जिस से कहूँ 'असलम'
चराग़-ए-रहगुज़र हूँ और जलना चाहता हूँ मैं