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ग़ज़ल
इधर से भी कोई गुज़रे कि मैं जिस से कहूँ 'असलम'
चराग़-ए-रहगुज़र हूँ और जलना चाहता हूँ मैं
असलम महमूद
ग़ज़ल
कोई काम 'असलम' बना ही नहीं वहशतों के बग़ैर
जला कर चराग़-ए-जुनूँ ताक़-ए-इदराक पर रख दिया
असलम महमूद
ग़ज़ल
लो तुम भी शौक़ से 'असलम' से एहतियात रखो
हमें भी आ गया अपनों से फ़ासला रखना
मोहम्मद असलम ख़ान असलम
ग़ज़ल
सामने शाह-ए-वक़्त के 'असलम' कौन कहे ये बात
चोर न थे फ़नकार थे हम फिर काट लिए क्यूँ हात