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ग़ज़ल
क़बा-ए-ज़ोहद की पाकीज़गी तो देख चुके
शराब-ख़ाने में दामान-ए-तर की बात करो
अख़्तर अंसारी अकबराबादी
ग़ज़ल
मौसम-ए-गुल में कम-नज़र चुनते रहे हैं ख़ार क्या
हाथ है क्या लहू लहू दामन-ए-तार-तार क्या
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
ग़ज़ल
उस क़ुल्ज़ुम-ए-गुनाह में डूबा हुआ हूँ मैं
जिस में है एक मौजा-ए-दामान-ए-तर शराब
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
उस क़ुल्ज़ुम-ए-गुनाह में डूबा हुआ हूँ मैं
जिस में है एक मौजा-ए-दामान-ए-तर शराब
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
फ़िक्र-ए-दोज़ख़ में हमें रफ़अ'-मआ'सी की पड़ी
आग पर दामन-ए-तर को हैं सुखाते जाते