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ग़ज़ल
बशीर बद्र
ग़ज़ल
या वो सूरत ख़ुद जहान-ए-रंग-ओ-बू महकूम था
या ये आलम अपने साए से दबा जाता हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
दबा रक्खा है इस को ज़ख़्मा-वर की तेज़-दस्ती ने
बहुत नीचे सुरों में है अभी यूरोप का वावैला
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
मंज़िल-ए-इश्क़ से गुज़र बे-ख़ुद-ओ-मस्त-ओ-बे-ख़बर
चोट लगे तो उफ़ न कर दिल को दबा के भूल जा