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ग़ज़ल
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें
यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें
मजरूह सुल्तानपुरी
ग़ज़ल
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
नीले रंग में डूबी आँखें खुली पड़ी थीं सब्ज़े पर
'अक्स पड़ा था आसमान का शायद इस पैमाने में
मुनीर नियाज़ी
ग़ज़ल
उन्हें जब मेहरबाँ पा कर सवाल-ए-वस्ल कर बैठा
दबी आवाज़ से शरमा के वो बोले ये मुश्किल है
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
अज़ीज़ नबील
ग़ज़ल
शकील आज़मी
ग़ज़ल
ये जो आग सी है दबी दबी नहीं दोस्तो मिरे काम की
वो जो एक आन में फूँक दे उसी शोलगी की तलाश है