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ग़ज़ल
ये जो कहा कि पास-ए-इश्क़ हुस्न को कुछ तो चाहिए
दस्त-ए-करम ब-दोश-ए-ग़ैर यार ने रख दिया कि यूँ
एस ए मेहदी
ग़ज़ल
अज़ीज़ क़ैसी
ग़ज़ल
यहाँ तक तो मुझे दस्त-ए-करम पर नाज़ है उन के
अगर अब हाथ फैलाऊँ तो फैलाया नहीं जाता
जाफ़र अब्बास सफ़वी
ग़ज़ल
मोरिद-ए-इल्ज़ाम क्यों ठहरे भला दस्त-ए-करम
माँगने वाले तिरा लहजा ही गुस्ताख़ाना था
शफ़ाअतुल्लाह ख़ाँ सहर
ग़ज़ल
मुनफ़रिद है फ़ैज़-बख़्शी में तिरा दस्त-ए-करम
और सलीक़े में तिरे दर की गदाई भी जुदा
इक़बाल सलाहुद्दीन
ग़ज़ल
न मेहरबाँ कभी हम पर हुआ है दस्त-ए-करम
तमाम 'उम्र तुम्हारे नियाज़-मंद रहे