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ग़ज़ल
शोर-ए-दरिया-ए-वफ़ा इशरत-ए-साहिल के क़रीब
रुक गए अपने क़दम आए जो मंज़िल के क़रीब
इफ़्तिख़ार आज़मी
ग़ज़ल
जिन को तौक़ीर-ए-रह-ओ-रस्म-ए-वफ़ा याद नहीं
क्या गिला उन से करें जिन को ख़ुदा याद नहीं
अंजुम उसमान
ग़ज़ल
शरह-ए-जाँ-सोज़-ए-ग़म-ए-अर्ज़-ए-वफ़ा क्या करते
तुम भी इक झूटी तसल्ली के सिवा क्या करते
ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ
ग़ज़ल
दिल में मत ढूँड कि ऐ तालिब-ए-ईसार-ओ-वफ़ा
अब ये अल्फ़ाज़ किताबों में नज़र आते हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
बस इसी बात पे वो शख़्स ख़फ़ा है मुझ से
शहर में तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा है मुझ से
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
ये समझ लो नाशनास-ए-रह-ए-मंज़िल-ए-वफ़ा है
जो क़दम क़दम पे पूछे अभी कितना फ़ासला है
मख़्दूम ज़ादा मुख़्तार उस्मानी
ग़ज़ल
ज़िंदगी भर मैं रहा हूँ रहरव-ए-राह-ए-वफ़ा
इन वफ़ाओं की मगर मैं ने सज़ा पाई बहुत
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
हम ने माना कि तही-दस्त हैं पर सब के लिए
दिल में गंजीना-ए-इख़लास-ओ-वफ़ा रखते हैं
शान-ए-हैदर बेबाक अमरोहवी
ग़ज़ल
फिर किसी ज़ख़्म के खुल जाएँ न टाँके देखो
रहने दो तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो