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ग़ज़ल
दयार-ए-दूर में मैं तो नहीं आता हूँ याद उन को
न जाने वो मुझे फिर क्यों बराबर याद आते हैं
ए. डी. अज़हर
ग़ज़ल
न रहनुमा है न मंज़िल दयार-ए-उल्फ़त में
क़दम उठाते ही ख़िज़्र-ए-शिकस्ता-पा तो मिला
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
कोह-शिगाफ़ तेरी ज़र्ब तुझ से कुशाद-ए-शर्क़-ओ-ग़र्ब
तेग़-ए-हिलाल की तरह ऐश-ए-नियाम से गुज़र
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
रसाई जिन की थी सरकार-ए-शर्क़-ओ-ग़र्ब के दर तक
वो शम्अ-ए-दीन को ले कर हज़ारों मील तक पहुँचे
ज़हीर अब्बास सायर
ग़ज़ल
हर लहज़ा इंहिदाम का है ख़ौफ़ मुझ को 'होश'
मैं इस दयार-ए-शोर-ओ-शर-ए-ज़लज़ला में हूँ
इब्राहीम होश
ग़ज़ल
कैफ़ मुरादाबादी
ग़ज़ल
ग़ौग़ा है शर्क़ ओ ग़र्ब ओ जुनूब ओ शुमाल में
फ़ित्ने जगा गई तिरी रफ़्तार हर तरफ़
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
ये शर्क़-ओ-ग़र्ब के ऊँचे पहाड़ ख़ामी हैं
हक़ीक़तन मुझे हासिल है जिस्म-ए-फ़ौलादी