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ग़ज़ल
जल्वा दिखलाए जो वो अपनी ख़ुद-आराई का
नूर जल जाए अभी चश्म-ए-तमाशाई का
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
ग़ज़ल
क्यूँ तिरे हिज्र के मंज़र पे सितम ढाते हैं
ज़ख़्म भी देते हैं और ख़्वाब भी दिखलाते हैं
कफ़ील आज़र अमरोहवी
ग़ज़ल
हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं
हम को दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग
राही मासूम रज़ा
ग़ज़ल
मुझे दुनिया अपनी छब दिखलाने रोज़ चली आती है मगर
कोई दोनों बीच आ जाता है पर जाने कौन आ जाता है
सलीम कौसर
ग़ज़ल
मुँह न दिखलावे न दिखला पर ब-अंदाज़-ए-इताब
खोल कर पर्दा ज़रा आँखें ही दिखला दे मुझे
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
आज की शब तो कट ही चली है ख़्वाबों और सराबों में
आने वाले दिन अब देखें क्या मंज़र दिखलाते हैं