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ग़ज़ल
निकली तो हैं सज-धज के तिरी याद की परियाँ
ख़्वाबों के मगर राज दुलारे नहीं निकले
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
शीशा जब भी टूटेगा झंकार फ़ज़ा में गूँजेगी
जब ही कोमल देश दुलारे पत्थर से टकराए हैं
जमील अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
सहमी सहमी गूँगी बहरी एक गुजरिया मेरी थी
हँसते गाते धूल उड़ाते राज-दुलारे उस के थे
कहकशाँ तबस्सुम
ग़ज़ल
अख़्तर अंसारी
ग़ज़ल
फ़लक के बा'द है कुछ न ज़मीं से पेशतर कुछ है
ख़ुदाया फिर कहाँ तेरे दुलारे साथ रहते हैं