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ग़ज़ल
अज़ीज़ नबील
ग़ज़ल
जब चारों-ओर अँधेरा था सच कम था झूट घनेरा था
दरिया से बड़े इक शख़्स का इक दरिया के किनारे डेरा था
सईद अहमद अख़्तर
ग़ज़ल
मिरी धड़कन में जिन बे-ताबियों ने डेरा डाला है
उन्ही बे-ताबियों की इंतिहा से चोट लगती है