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ग़ज़ल
घट घाट अंधेरा है कैसे बाँधोगे कहाँ नय्या अपनी
आवाज़ किसे दोगे 'क़ैसी' चौ-धाम यहाँ सन्नाटा है
अज़ीज़ क़ैसी
ग़ज़ल
धूम ये बादा-कशों की है कि मय-ख़ाने में
मस्त जाते हैं सुराही की ग़टा-ग़ट से लिपट
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
यास-ओ-उमीद-ओ-शादी-ओ-ग़म ने धूम उठाई सीने में
ख़ूब मुझे है आज धमा-धम मार-कुटाई सीने में