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ग़ज़ल
वक़्त ने ज़ेहन में धुँदला दिए तेरे ख़द-ओ-ख़ाल
यूँ तो मैं टूटते तारों का धुआँ तक देखूँ
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
कर रहा है ज़ेहन में गर्दिश कोई धुँदला सा अक्स
लग रही है उस की सूरत जानी पहचानी मुझे
जहाँगीर नायाब
ग़ज़ल
एक धुँदला सा तसव्वुर है कि दिल भी था यहाँ
अब तो सीने में फ़क़त इक टीस सी पाता हूँ मैं
आग़ा हश्र काश्मीरी
ग़ज़ल
बहुत धुँदला गया यादों की रिम-झिम में दिल-ए-सादा
वो मिल जाता तो हम ये आईना तब्दील कर लेते
सलीम कौसर
ग़ज़ल
ख़्वाब जो देखे थे मैं ने वो भी अब धुँदला गए
अब तो तुम आ जाओ साहब अब बहुत तन्हा हूँ मैं