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ग़ज़ल
वो भी अपनी आँखों में नाख़ून ही ले कर बैठे थे
दिखने में जिन की सूरत थी बहुत ही भोली बाबू-जी
कुंवर बेचैन
ग़ज़ल
अक्सर ख़्वाब में दिखने वाले एक पुराने मंज़र में
इक जाना पहचाना चेहरा दूर खड़ा मुस्काता है
ज़ुल्फ़िक़ार ज़की
ग़ज़ल
समझता हूँ तिरी सारी कहानी मैं कि क्या होगी
है दिखने में अगर ऐसा तिरे उन्वान का मंज़र
ताहिर अदीम
ग़ज़ल
निशाँ दिखने लगे हैं जब से चेहरे पे जुदाई के
ये शीशा चैन से मुझ को सँवरने भी नहीं देता
कुँवर तानी
ग़ज़ल
हर बात पर दुनिया की ढेरों देख कर चालाकियाँ
दिखने लगीं हैं जाने कितनी ख़ूबियाँ नादान में