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ग़ज़ल
नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं
ठंडी हवाएँ भी तिरी याद दिला के रह गईं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
पहले दिल को आस दिला कर बे-परवा हो जाता था
अब तो 'अज़्म' बिखर जाता हूँ मैं ख़ुद को बहलाने में
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी
सुदर्शन फ़ाकिर
ग़ज़ल
कहीं बोसे की मत जुरअत दिला कर बैठियो उन से
अभी इस हद को वो कैफ़ी नहीं हुश्यार बैठे हैं
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
तुम अपने शिकवे की बातें न खोद खोद के पूछो
हज़र करो मिरे दिल से कि इस में आग दबी है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो
दोस्तो अपना लुत्फ़-ए-ख़ास याद दिला दिया करो
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरत
पर दिल को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
ये बुरी ख़ू है दिला तुझ में ख़ुदा की सौगंद
देख उस बुत को तू हैरान न रह जाया कर
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
जुज़ सब्र दिला चारा नहीं इश्क़-ए-बुताँ में
करते हैं ये ज़ुल्म और तज़ल्लुम से ज़ियादा