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ग़ज़ल
सहरा के लिए भेज समुंदर से दिशा ले
इन झुलसे हुए जिस्मों को रानाई अता कर
सय्यद मोहम्मद अहमद नक़वी
ग़ज़ल
पाँव बढ़ते नहीं कुचले हुए रस्तों की तरफ़
तेरा 'मक़्सूद' अलग अपनी दिशा माँगता है
मक़सूद अनवर मक़सूद
ग़ज़ल
बहुत मुख़्लिस है सादा-दिल है सब को जान से प्यारा
वो मरकज़ पर है उस को हर दिशा आवाज़ देती है
तिलक राज पारस
ग़ज़ल
जलेगा दिल तो धुआँ उठेगा ये आग ऐसे नहीं बुझेगी
नगर नगर ये ख़बर पहुँचती मगर हवा की अजब दिशा थी
हिना अम्बरीन तारिक़
ग़ज़ल
जब तक उस का शहर दिखा देखा रेल की खिड़की से
बा'द हज़ीं फिर बैठ के मैं ने याद निचोड़ीं आँचल में
तारा इक़बाल
ग़ज़ल
जहान-ए-फ़िक्र में मिस्ल-ए-हवा चलता रहा हूँ मैं
लिए गर्द-ए-ख़िरद चारों दिशा चलता रहा हूँ मैं
सलमान सरवत
ग़ज़ल
किस का चेहरा उभर रहा है दिल के मशरिक़ से
दिशा दिशा में घूम रहे हैं हाथ बढ़ाए हम