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ग़ज़ल
फ़क़त दो-बोल ही चाहत के दुनिया की ज़रूरत हैं
मैं लोगों के दिलों में ये मसर्रत बाँट देता हूँ
सईद इक़बाल सादी
ग़ज़ल
जीने को बस एक तबस्सुम एक नज़र भी काफ़ी है
और कहीं दो बोल मोहब्बत के वो हम से बोले टुक
जावेद वशिष्ट
ग़ज़ल
मैं तो इस शख़्स से कहता रहा हर बार 'नबील'
मुझ को दो बोल मोहब्बत के सुना कर ले जाए
नबील अहमद नबील
ग़ज़ल
फ़िदा होता मैं जान-ओ-दिल से तेरी जुम्बिश-ए-लब पर
अगर दो बोल उल्फ़त के तिरे लब भी अदा करते