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ग़ज़ल
बला की बेड़ियाँ उल्फ़त में पहनीं जान-ए-मन दो दो
दिल-ए-बेताब अपना एक ज़ुल्फ़-ए-पुर-शिकन दो दो
हामिद हुसैन हामिद
ग़ज़ल
दो दो कर के बोसा-ए-मौऊद जब मैं ने गिने
हँस के पूछा हैं इकट्ठे ये किए कब कब के दो
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
ग़ज़ल
उन महमिलों पे आवे मजनूँ को क्यूँ न हसरत
जिन महमिलों के अंदर दो दो सवारियाँ हैं
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
बड़ी तशवीश फैली है वतन के तारकीनों में
उन्हें मिलती हैं सौ सौ धमकियाँ दो दो महीनों में