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ग़ज़ल
इधर फ़रियाद बे-तासीर उधर सीधी नज़र उन की
हमारी जान के ख़्वाहाँ हुए नावक-फ़गन दो दो
हामिद हुसैन हामिद
ग़ज़ल
बोसा देते हो अगर तुम मुझ को दो दो सब के दो
जीभ के दो सिर के दो रुख़्सार के दो सब के दो
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
ग़ज़ल
दो दो दरिया मेरी आँखों में रवाँ रहने लगे
और मैं प्यास से हलकान था अच्छा-ख़ासा
शिव ओम मिश्रा अनवर
ग़ज़ल
दो दो दरिया मेरी आँखों में रवाँ रहने लगे
और मैं प्यास से हलकान था अच्छा-ख़ासा
शिव ओम मिश्रा अनवर
ग़ज़ल
गर बैठते हैं महफ़िल-ए-ख़ूबाँ में हम उस बिन
सर ज़ानू से उठता नहीं दो दो पहर अपना
जुरअत क़लंदर बख़्श
ग़ज़ल
दो दो पहर तक उस के आगे खड़ा रहा मैं
पर उस ने ज़िद के मारे भर कर नज़र न देखा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
किस तरह उन्हें सोचूँ किस रुख़ से उन्हें परखूँ
रुख़ उन के भी दो दो हैं इंसाँ नहीं सिक्के हैं
वाजिद सहरी
ग़ज़ल
नाम को दाना दो दो दिन तक मेरी तरह देखोगे नहीं
जब मैं बहुत समझाऊँगा तो थोड़ा सा खाना खाओगे तुम