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ग़ज़ल
'शरफ़' और 'रश्क' के कहने से कुछ तुक-बंदियाँ कर लीं
'हसन' अफ़्कार में हम से दो-ग़ज़ला हो नहीं सकता
हसन बरेलवी
ग़ज़ल
अगर इस में तू सह-गज़ला जो कहे तो काम भी है
नहीं 'मुसहफ़ी' मज़ा क्या जो दो रू कबाब उल्टा
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
वो डाल दी ग़लत अंदाज़ इक नज़र तू ने
कि मैं ज़मीं पे रहा अर्श पर दिमाग़ रहा
सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी
ग़ज़ल
धूप हो कि छा जाए फिर घटा जो तुम कह दो
ख़्वाहिशें हमारी अब और क्या जो तुम कह दो
डॉ भावना श्रीवास्तव
ग़ज़ल
शो'ला-ए-हुस्न कहीं ख़ाक न कर दे मुझ को
चेहरा-ए-नूर पे ज़ुल्फ़ों की घटा तो दे दो
फ़ज़ल हक़ अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
क़ुर्बतें प्यार की तक़्दीस घटा देती हैं
प्यार को लम्स की जन्नत से जुदा रहने दो
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
आँसू भी पियूँ मैं तो रहूँ प्यासा का प्यासा
तुम बाल बिखेरो तो घटाओं को घटा दो