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ग़ज़ल
मज़दूरी पर जाता हूँ तो शेर सिसकते रहते हैं
डॉलर की ख़्वाहिश ने मेरे फ़न-पारों को मार दिया
खालिद इरफ़ान
ग़ज़ल
मिरे क़ातिल मैं तुझे चाहूँगा डॉलर की तरह
तुझ पे लिक्खूंगा क़सीदे किसी शा'इर की तरह
अलताफ़ किश्तवाड़ी
ग़ज़ल
जो क़ीमत है मोहब्बत की कभी वो कम नहीं होगी
चला ले तू जहाँ चाहे ये हैं डॉलर मोहब्बत के
इलियास चिश्ती
ग़ज़ल
दो-चार दिन की बात है दिल ख़ाक में मिल जाएगा
जब आग पर काग़ज़ रखा बाक़ी बचा कुछ भी नहीं