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ग़ज़ल
उन्हें पर्वा नहीं है कुछ न हो गर बाड़ का डोरा
कि डोरे डालते हैं यार की हम तेग़-ए-उर्यां पर
असद अली ख़ान क़लक़
ग़ज़ल
देख कर वो ज़ख़्म-ए-दिल की करती क्या बख़िया-गरी
नूर का डोरा सवाद-ए-चश्म-ए-सोज़न में नहीं
शोला करारवी
ग़ज़ल
फ़ना बुलंदशहरी
ग़ज़ल
गाँठ अगर लग जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी
लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है
हस्तीमल हस्ती
ग़ज़ल
'मीरा-जी' क्यूँ सोच सताए पलक पलक डोरी लहराए
क़िस्मत जो भी रंग दिखाए अपने दिल में समोना होगा