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ग़ज़ल
लाल डोरे तिरी आँखों में जो देखे तो खुला
मय-ए-गुल-रंग से लबरेज़ हैं पैमाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
ग़ज़ल
ख़ुदा के दामन-ए-रहमत से अपना दामन-ए-इस्याँ
वो क्या टाँकेगा जिस के आँख में डोरे नहीं रहते
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ख़त आप भेजेंगे मुझ को पतंग पर लिख कर
ये डोरे जाते हुए हैं उड़ाइए न मुझे
पंडित दया शंकर नसीम लखनवी
ग़ज़ल
वासिफ़ फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
छलकी हुई आँखों में मय-ए-सुर्ख़ के डोरे
ज़ुल्फ़ों की वो लहराई घटा याद है अब तक
सज्जाद बाक़र रिज़वी
ग़ज़ल
रात भी ख़ामोश थी और चाँद भी ग़मगीन था
आँख में डोरे लिए वो सुर्ख़ियाँ अच्छी लगीं