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ग़ज़ल
गरचे हैं मूनिस-ओ-ग़म-ख़्वार तग-ओ-दौ में सही
पर तिरी तब' को कब राह पे ला सकते हैं
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
ये मैदान-ए-तग-ओ-दौ है मशक़्क़त ही मशक़्क़त है
वही जीतेगा जो सौ बार हारा हम न कहते थे
ज़ीशान साजिद
ग़ज़ल
नूह नारवी
ग़ज़ल
इस तग-ओ-दौ ने आख़िरश मुझ को निढाल कर दिया
जीने के एहतिमाम ने जीना मुहाल कर दिया