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ग़ज़ल
आए हो अब तो दुख़्तर-ए-रज़ देखते हो क्या
मशरब में मय-कशो ये तुम्हारी हलाला है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
दुख़्तर-ए-रज़ को नहीं छेड़ते हैं मतवाले
हज़र उस फ़ाहिशा से करते हैं हुरमत वाले
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
सर पर से तो मंदील को अब दूर कर ऐ शैख़
गर्दन तिरी इस बोझ से अब करती है लच-लच
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
'ज़ौक़' ज़ेबा है जो हो रीश-ए-सफ़ेद-ए-शैख़ पर
वसमा आब-ए-बंग से मेहंदी मय-ए-गुल-रंग से
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
उसी के हुस्न-ए-बे-परवा को देता हूँ दुआएँ 'शैख़'
कि जिस के फ़ैज़ से मेरी ग़ज़ल के बाल-ओ-पर निकले
नूर अहमद शैख़
ग़ज़ल
'शैख़' जी इन मस्त आँखों से रहो कुछ दूर दूर
जो यहाँ तक आ गया वो बच के मुश्किल से गया
नूर अहमद शैख़
ग़ज़ल
हमें दैर ओ हरम शैख़ ओ बरहमन से नहीं मतलब
हमारा दिल तो अपने दिल को बैतुल्लाह जाने है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
इसे कहें हैं सुना होगा शैख़ ख़ौफ़ ओ रजा
उधर तू तौबा इधर मैं गुनाह करता हूँ
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
क्या हुआ गर शैख़ यारो हाजी-उल-हरमैन है
तौफ़-ए-दिल का हक़ में उस के दीन फ़र्ज़-ए-ऐन है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
ग़ज़ल
मोतकिफ़ हो शैख़ अपने दिल में मस्जिद से निकल
साहिब-ए-दिल की बग़ल में दिल इबादत-ख़ाना है