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ग़ज़ल
कल्स का दुल्लर का दाछीगाम का माडर का नाम
मदमती का त्रागा-बल का और शेरासर का नाम
बुलबुल काश्मीरी
ग़ज़ल
तीखे तेवर बाप का ग़ुस्सा माँ की ममता लाड दुलार
मेरे लिए ये बेश-कीमती सरमाया है सब का सब
इसहाक़ असर
ग़ज़ल
सब ने माना मरने वाला दहशत-गर्द और क़ातिल था
माँ ने फिर भी क़ब्र पे उस की राज-दुलारा लिक्खा था
अहमद सलमान
ग़ज़ल
दिल धड़कता है मिरा लूँ बोसा-ए-रुख़ या न लूँ
नींद में उस ने दुलाई मुँह से सरकाई तो है
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
खिंची कंघी गुँधी चोटी जमी पट्टी लगा काजल
कमाँ-अबरू नज़र जादू निगह हर इक दुलारी है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
निकली तो हैं सज-धज के तिरी याद की परियाँ
ख़्वाबों के मगर राज दुलारे नहीं निकले
राजेन्द्र नाथ रहबर
ग़ज़ल
शीशा जब भी टूटेगा झंकार फ़ज़ा में गूँजेगी
जब ही कोमल देश दुलारे पत्थर से टकराए हैं
जमील अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
बाबा कहते ये जो खंडर है सीता-राम का मंदिर था
उस मंदिर की एक पुजारन राम-दुलारी होती थी
जानाँ मलिक
ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
सहमी सहमी गूँगी बहरी एक गुजरिया मेरी थी
हँसते गाते धूल उड़ाते राज-दुलारे उस के थे